आयुर्वेद 1

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बहेड़ा , आँवला , कोयल ,ढाक , तुलसी , पिठवन , पोदिना , नीम ,भुँई आँवला , देवदाली (वन्दाल ) , चित्रक , ऊँटकटेरी , अजवाईन , पालक , तालमखाना , अगस्त्य

                                                                    बहेडा

नाम -सं. विभितक,हि.बहेडा,बं.बयडा,बहेडा,म.बहेडा घटिंगवृक्ष, गु.बडां,अंग्रेजी में.मेरिबेलन - बेलिरिक , फा.बर्लेले |    इसके विभितक,अक्ष,कर्षफल आदि संस्कृत नाम हैं | इसका वृक्ष बडा होता है |ऊंची भूमि पर इसके वृक्ष होते हैं | महुवा के पत्ते के तुल्य इसके भी पत्ते होते हैं | इसका फूल बारीक होता है | फल जायफल से कुछ बडा होता है | एक तोले तक इसका फल होता है | इसकी मात्रा दो मासे तक है | प्रयोग में इसकी छाल ली जाती है | इसकी गुदी उन्माद करती है ; गुदी लेप करने से दाह शांत होता है यह खाने में गरम है ,लगाने में ठण्डा ,रूखा है, नेत्रों को गुण करता है | इसका वक्कल खांसी को दूर करता है | कृमीरोग और स्वर दोष  को दूर करता है | सर्दी,प्यास,वात ,और कफ को शांत करता है | इसकी प्रतिनिधी छोटी हर्र है ,अर्थात बहेडा न मिल सके तो छोटी हर्र लेना चहिए | बहेडे के अवगुण सहद के शर्बत से दूर होता है |


                                                               आंवला

सं.आमलकी,हि. आंवला,बं.आम्ला,मा.आंवला,गु.आंवला , अंग्रेजी-ऐब्लि कमिरी बेलन या घूसबेरी ,फा-आम्लझ | इसके धात्री,आमलक, तिष्यफला आदि संस्कृत नाम है | आमला का वृक्ष बडा होता है | इसकी पत्ती इमली की पत्ती के समान छोटी होती है ,इसका फूल पीला होता है , कडी भूमि पर इसके वृक्ष होते हैं | फाल्गुन मास में इसके फल अच्छे होते हैं ,काशी में इसके फल बडे होते हैं | इसका लोग मुरब्बा ,अचार बनाते हैं | यह शीतल तथा रूखा है | रक्त पित्त तथा प्रमेह रोग को दूर करता है | यह खट्टा रस होने से वात को , मधुर और शीतल गुण से पित को तथा रूखे कसैले गुण से पित को हरता है | इस प्रकार यह त्रिदोष को दूर करता है | एवं प्यास को शांत करता है |  तथा वमन को रोकता है |यह भ्रम और श्रम क निवारण करता है | यह अजीर्ण को हरता है | और तील्ली को अवगुणकारी है | इसकी प्रतिनिधी हर्र है ,अर्थात इसके न मिलने पर हर्र लेनी चाहिए | इसका अवगुण शहद से दूर होता है | सब प्रयोगों में आवला की फल की गुदी लेनी चहिए | इसकी मात्रा चार मासे की है आंवला की चटनी आंवला भून कर बनाना चहिए | उसके खाने से कफ ,पित्त ,दाह और शरीर की गरमी को शांत करता है | आंवला के शीकंजबीन भी बनता है | और यह पीत और गरमी के रोग को देते हैं | आंवला की गूदी भिगोकर उसके पानी से शिर मले तो बाल सफेद नहीं होते | सदैव शिर में मलने से बाल काले रहते हैं | नाजला नहीं उतरता | एक बात वैद्य को सदैव ध्यान में रखना चाहिए कि जो फल में गुण ओता है वही गुण गुटली में भी होत है | और पत्तों में भी अनेक गुण होते हैं | आमला की पत्ती की राख खाने से खांसी शांत हो जाती है | आमला,हर्र,बहेडा इन तीनों में अनेक गुण हैं | इन तीनो को त्रीफला कहते हैं | त्रीफला सब रोगों को दूर करती है | यहां नाम मात्र के दो एक गुण लिखे गये हैं | आंवले को तेल में मिला कर लगाने से खुजली दूर होती है | गाय के दूध के साथ सूखे आंवले क चुर्ण खाने से स्वर भेद दूर होता है | आंवला का रस शहद और पीपल के साथ खाने से कफ और स्वास को अच्छा करता है | आंवला का रस हल्दी के साथ खाने से प्रमेह को दूर करता है | सूखे आंवले को घी में भूनकर और पानी में पीसकर माथे में लेप करने से नाक से खून का गिरना बन्द हो जाता है | आंवले का रस घी के साथ पीने से मूर्छा दूर होती है | आंवले का रस शहद डालकर पीने से योनीदाह ठीक होता है | आंवले का चूर्ण शहद के साथ पीत्त शूल दूर करता है | आंवले का रस अम्लपीत्त को दूर करता है | आंवला खाने से जल्दी वृद्धावस्था नहीं आती |


कोयल

नाम -सं - अपराजिता , विष्णुकांता ,हिं - सफेद कोयल , नीली कोयल ,बं - अपराजिता, म - गोकर्ण काली , पांढरी ,गु-गरणी अं - मजारयुत एर्हिदी | विवरण - यह खेत ,बाग और उपवनों में होती है | पत्ते छोटे गुलाब की तरह होते हैं | इस पर फल्ली लम्बी आती है | कोयल 2 प्रकार के होते हैं | सफेद फूल वाली और नीले फूल वाली | गुण - सफेद कोयल - चरपरी ,शीतल ,कडुवी , बुद्धीदायक ,नेत्रहितकारी ,कसैली ,सारक ,विषनाशक तथा त्रिदोष , मस्तक शूल ,दाह ,कुष्ट ,शूल ,आमवात,पित्तरोग,शोथ ,कृमि,व्रण ,ग्रहपीडा और सर्पविष को दूर करने वाली है | नीली कोयल - कडुवी ,स्निग्ध,त्रिदोषनाशक ,शीत वीर्य ,वात ,पित्त, ज्वर,दाह ,भ्रम,पिशाचबाधा,रक्तातिसार ,उन्माद,मदात्यय, श्वास,कास,श्वास,कास,कफ,कुष्ठ ,जंतु (कृमी) और क्षय रोग को नष्ट करती है | शेष सभी गुण सफेद कोयल की तरह हैं |


ढाक

नाम - सं - पलाश ,हिं - ढाक ,केशूधारा काकरिया पलाश ,बं -पलाशगाछ ,म- पलस,गु- खाखरा ,अं -डाउनी ब्राँच व्युटिया | विवरण - ढाक की जड के रस से ताम्बा ,पारा हरताल ,ये तीनों भष्म होते हैं | यदि भाग्य प्रबल हो तो ताम्बे से स्वर्ण भी बन जाता है | उसकी रिति यह है कि पारा अथवा हरताल ,किंवा ताम्बे का चूरा तीन तोला लेवे पहले मदार के दूध में 3 दिन घोटे बाद में ढाक की जड के रस में 3 दिन घोटे अथवा अलग-अलग 2 एक साथ तीनों (पारा हरताल तांबा चूरा 3 तीन तोला ) घोटे फिर ढाक को गोल मोटी लकडी में खोखल कर उसमें तीनों की गोली बनाकर रक्खे फिर फिर उसमें धाक की छाल का रस भरे और कपड मिट्ती कर बिनुआ कंडों की आँच में धरे तो भष्म हो जाय यह कुष्ट रोग और नपुंसक रोग वाले को हितकारी है | अनुपान का ग्रंथों में देखे अथवा उत्तम वैद्य से पूछ कर देवे तो अनेक रोग नष्ट होते हैं | ढाक का फल गुड के साथ खाने से पेट के कीडे (केचुआ) सब गिर पडते हैं | धाक की गोंद धातु को पुष्ट करती है |


तुलसी

नाम - सं - आर्जक ,बर्बरी,बंनबर्बरी ,हिं - बर्बरी, वन तुलसी ,बं - बाबुइतुलसी ,बनइ तुलसी ,म- रान तुलसी ,गु -रान तुलसी मेद ,फा- पलंगमुष्क | विवरण- तुलसी का वृक्ष सभी जानते हैं | तुलसी 2 प्रकार का होता है | एक श्याम रंग की पत्ती वाली श्यामा तुलसी ,और दूसरी हरे रंग वाली रामा कहलाती है | तुलसी की अध्यात्मिक महत्व तो है ही इसके साथ-साथ भैतिक लाभ भी हैं | यहाँ पर हम केवल दवाई के तौर पर ही चर्चा करेंगे | यह सभी के आँगन की शोभा है पूज्य है सुबह शाम तुलसी की पूजा और परीक्रमा करना चाहिये | तुलसी में से होकर जो वायु बहती है उस वायु से वायु की शुद्धता होती है और विषैले कीडे नष्ट हो जाते हैं | श्याम तुलसी के पत्तों का रस साँप काटे मनुष्य के शरीर पर मले और मुख में रस भर देवे जब तक अधिक विष न चढे तब तक यह उपाय करने से रोगी अच्छा हो जाता है | तथा श्यामा तुलसी की पत्ती 3 तोला ,काली मिर्च 6 माशा ,लौंग 6 माशा ,इनको पीसकर मटर बारबर गोलियाँ बनाय प्रातः सायं खाय तो खाँसी श्वास दूर होती है तथा उपरोक्त तीनों में संखिया मिला कर तुलसी दल के रस में दिन भर घोटे और बाजरा के बराबर गोलियाँ बनावे | एक-एक गोली प्रातः सायं खाने से तिजारी ताप दमा आदि रोग शाँत होते हैं | तुलसी दल के रस को माता के दूध के साथ देने से बालक के अनेक रोग (ज्वर,दस्त ,वमन,दूध डालना आदि ) नष्ट हो जाते हैं | तुलसी रस कान के दर्द को दूर करता है | मलेरिया ज्वर तुलसी के पत्तों का रस और काली मिर्च से दूर होता है | तुलसी का रस मिश्री के साथ रक्तस्राव और चक्कर को भगाता है | तुलसी का पत्ते रगडने से दाद दूर होती है | तुलसी प्रसव वेदना को शाँत करती है | अजवाईन और तुलसी के पत्ते पीस कर नित्य पीने से शीतला रोग में विशेष लाभ होता है | सावधानियाँ - तुलसी का प्रयोग अति संकट स्थिति में ही करे जब कोई उपाय न हो तुलसी के अलावा और व्यक्ति के पास कोई वेद्य न हो या इसके अलाव कोई औषधि न हो तभी यह व्यवहार कर सकते हैं | तुलसी वास्तव में कोई पौधा नहीं है | यह तो कृष्ण प्रिया है | वृन्दावन की अधिश्वरी है | किसी तरह से दवा न मिले कोई तो ही तुलसी का प्रयोग करना चाहिये | और प्रसादी हो तो और भी उत्तम है अन्यथा ताजा तोड कर उन्हें भगवान कृष्ण को अर्पण करके फिर व्यवहार में लाया जा सकता है | वास्तव में जिस दिन तुलसी का प्रयोग केवल दवाई के रूप में होगा यह दिन बडा ही दुर्भाग्य का दिन आ गया समझना चाहिये | भगवान के भक्त सदा तुलसी महारानी का सुबह साम पूजा करते हैं | उनसे कृपा की याचना करते हैं कि हे महारानी तुलसी हमें भी वृन्दावन में वास दे दो जिसे कि राधा कृष्ण का प्रेम हमें प्राप्त हो सके | तुलसी प्रतिदिन  प्रसाद के साथ खाना चाहिये | प्रसाद के रूप में नित्य व्यवहार किया जा सकता है | परंतु  दवाई के रूप में केवल समझ कर व्यवहार करना मुर्खता ही होगा | हमें भगवान की भक्ति के लिये ही इसका प्रयोग करें तो अच्छा है |


पिठवन

नाम - सं - पृष्टिपर्णी (पृश्निपर्णी) ,हिं- पिठवन , बं- चाकुले ,म- पीठावर्णी , गु- पृष्टिपर्णा | विवरण - पिठवन पश्चिम और बंग देश में अधिकता से उत्पन्न होती है | पत्ते गोल बेलदार होते हैं | फूल गोल सफेद कुछ नीले जटायुक्त होते हैं | मात्रा 3 आने की भर है | व्यवहार में इसकी जड ली जाती है | परंतु अल्प मूल्य होने से सब देशांतरों में इसके बेल का ही व्यवहार किया जाता है | गुण - पिठवन ,मधुर ,सारक ,गरम ,कटु ,तिक्त तथा शमन है | इससे त्रिदोष नष्ट होते हैं | वीर्यवर्धक वमन निवारक दाह नाशक और ज्वर ,उन्माद ,श्वास ,कास ,रक्त,तृषा , तथा अतिसार को नष्ट करती है |


पोदीन

विवरण - पोदीना की छत्ता होता है | पोदीना की पत्ती और मिश्री मुख में चूसने से मुख के छाले दूर होते हैं| पोदीना की पत्ती ,मिश्री ,लौंग,काली मिर्च औटा कर पीने से दस्त और वमन शाँत होता है | इनमें लौंग चार ,मिर्च 7,मिश्री 9 माशा ,पोदीना तोला भर लेवे , पोदीना की चटनी पीत्त को शाँत करती है | और वमन को रोकती है | पोदीना वायु और कृमि को दूर करती है | पोदीना के रस की नास से पीनस रोग अच्छा हो जाता है | पोदीना दाह को दूर करता है | पोदिना से बिच्छू का विष भी दूर होता है | पोदीना का रस आदि के रस के साथ पीने से उदर शूल दूर होता है | पोदीना से अरूचि और अजीर्ण में भी लाभ होता है | पोदीना और सौंफ का अर्क हैजा को दूर करता है |


नीम

नाम - सं - निम्ब ,हिं- नीम ,बं-निमगाछ ,म-कडुनिंब,गु-लिंबडो,अं-नीमट्री ,फा - नेनबू नीम दरख्त | विवरण - नीम का वृक्ष बडा होता है | नीम के वृक्ष के पंचाग में अनेक  गुण हैं | नीम पर की गुर्च को लेकर पीसे और सेंधा नमक मिलाय पानी के साथ औटा कर पीवे अथवा चटनी के समान बनाय गरम कर घोटे तो सब प्रकार के ज्वर  शाँत हो जाते हैं | नीम की मुलायम टुँडसी  7 ,काली मिर्च  4 पीस कर गरम करे और  सेंधा नमक  डाल कर पीवे  तो ज्वर दूर होवे | फोडा फुँसी और घाव को अच्छा करने में नीम प्रसिद्ध है | नीम का पँचाग समयानुसार  सेवन करने से ज्वर समीप नहीं आता , नीम की पत्ती का अर्क शहद के साथ मिलाकर पीने से पेट के कीडे मर जाते हैं | कच्चा पक्का सबही प्रकार का नीम फोडों को हितकारी होता है | नीम की पत्ती का अर्क पीने से रूधिर दोष दूर होता है | निबौली की मींगी ,रसौत ,कपूर बराबर लेके पीसे और मस्से पर लगावे तो बवासीर रोग दूर होता है खुजली शाँत होती है | नीम की पत्ती औटा कर उस जल से स्नान करे अथवा नीम की सूखी पत्ती का धूना देता रहे अथवा नीम की साफ छाया में रहे तो महामारी आदि रोग उसको बाधा नहीं पहुँचाते | नीम की साफ पत्ती लेके सरसों अथवा अलसी के तेले में जलावे और पीसकर कुछ मोम मिलाकर मलहम बना ले यह मलहम घाव को भर कर अच्छा कर देता है | इसी  प्रकार नीम के अनेक गुण हैं |


भुँई आवला

नाम -सं - भूम्यालकी , हिं - भुँई आवला ,बं- भुँई आमला , म- भुँई आँवली , गु- भों आवली | विवरण - भुँई आवले के क्षुप छोटे -छोटे होएते हैं ,पत्तों के नीचे राई के दाने के समान फलों की शाखा होती है | गुण - भुँई आँवला कसैला ,खट्टा ,शीतल ,कडुवा मधुर और हलका होता है | यह प्रमेह ,विष ,पित्त ,प्यास ,श्वास,कास ,रक्त,पित्त नाशक और क्षत -क्षीण ,हिक्का ,दाह ,कुष्ट नाशक ,मूत्र रोग निवारक तथा पुत्र दायक है |


देवदाली (वन्दाल)

नाम- सं-देवदाली ,हिं- वन्दाल,घघरबेल ,बं- देयानाडा ,म- देवदालो,गु-कुकुड वेल्य , अं-विस्टलि ल्युफा | विवरण - देवदाली अथवा खखसा के वृक्ष की लता होती है | इसकी बेल बडी -बडी और लम्बी होती है | किसान लोग खेत की बाड पर बहुधा लगा देते हैं | इसके फूल सफेद ,पीले और लाल तीन प्रकार के होते हैं | फलों के ऊपर बहुत छोटे-छोटे काँटे होते हैं | इसका फल छोटी तरोई की तरह होता है | गुण - देवदाली रस और पाक में कडुवी ,तीक्ष्ण,गरम एवं चरपरी है तथा वमनकारक ,विष नाशक एवं पाण्डुरोग,कफ,श्वास ,कास,अर्श,क्षय,कामला,कृमि ,ज्वर,शोथ ,अरूचि और भूत बाधा को हरने वाली है | इसका मूल सारक (दस्तावर) कडुवा ,तथा गुल्माश ,कृमि,कफ एवं पाण्डुरोग नाशक है |


चित्रक

नाम - सं - चित्रक ,रक्त चित्रक ,हिं - चीता ,लाल चीता ,बं -पितेगाछ ,चिता ,म- चित्रक ,गु- चित्रा,फा-बेखबरन्दा ,अरबी - शितरझ,अं- पलंविगोकौरूलेऐसो | विवरण - चीता का छुप होता है | चीता की अनेक जाती है | सफेद फूल का ,लाल फूल का काले फूल फूल का और पीले फूल का इनमें सफेद फूल का सब स्थानों में होता है | और लाल फूल वाले तथा अन्य फूल के चीते देखने में बहुत कम आता है | गुण - चीता पाक में चरपरा ,रूक्ष ,उष्ण, कडुवा ,हल्का ,ग्राही,रसायन,तथा त्रिदोष नाशक है | अग्नि को बढाने वाला ,पाचक, कोढ , शोथ ,अर्श,कृमि,कास,संग्रहणी और उदर रोग को नष्ट करने वाली है | तथा रूचिदायक ,कण्डू , यकृत रोग ,क्षय को दोर करने वाला है | यह यह चरपरे पन से कफ का ,कडुवेपन से पित्त का और उष्णता से वात का नाश करता है | इस कारण चीता त्रिदोष हरने वाला है | लाल चीता - देह को स्थूल करने वाला ,रूचिकर ,कुष्टनाशक ,पारे को बँधने वाला ,लोहे को बेध करने वाला ,रसायन और शरीर को नवीन करने वाला है | काला चीता - इसका भक्षण करने से केश काले हो जाते हैं | गाय के सूँघे हुए काले चिते को लेकर दूध में डालने से दूध काला हो जाता है | व्यवहार - मूल ,मूल की छाल ,छाल की मात्रा 4 रत्ती की है |


ऊँटकटेर

नाम सं - ब्रह्माण्डी ,हिं - ब्रह्मदण्डी,ऊँटकटेरी,बं- घाघल दाडी ,म- ब्रह्मदण्डी,गु- ब्रह्मदण्डी ,तलकटों, अं- थिस्टल | ऊँटकटाई का फूल पीला होता है | उसमें छोटे-छोटे काँटे होते हैं | ऊँटकटाई के जड की छाल आधा पाव ,सोंठ तीन माशा ,मिश्री आधा पाव पीस कर दस पुडिया बाँधे , एक पुडिया सबेरे शाम गाय के पाव भर दूध के साथ पीवे तो गरमी प्रमेह दूर होती है | नकसीर बन्द हो |


अजवाईन की पत्ती

विवरण - अजवाईन के पत्ते कुछ बडे होते हैं | अजवाईन के पत्तों को सेंक कर सेधा नमक मिला कर खाने से खाँसी श्वास शाँत होती है | बालक की खाँसी दूर करना हो तो अजवाईन की पत्ती गरम कर अर्क निचोडे | वह अर्क नमक मिलाकर बालक को पिलावे अजवाईन खाकर उपर से गरम पानी पीये तो उदरशूल, अतिसार,खाँसी और अजीर्ण रोग दूर होते हैं | अजवाएन और गुड के सेवन से शीतपित्त दूर होता है | अजवाईन की पोटली सूँघने से जुकाम ,और शिरदर्द अच्छा हो जाता है | अजवाईन ,तील और सोंठ खाने से बहुमूत्र रोग दूर होता है | अजवाईन और काले नमक का चूर्ण मठा के साथ सेवन करने से गुल्म रोग दूर होता है | अजवाईन को थोडे से पानी में भिगो दे ,सुबह एक कटोरा का मुँह अपडा से बाँध कर उस पर उस भीगी अजवाईन को रख दे और उसके उपर एक तवा को रख कर तवा के उपर सुलगता हुआ कोयला रख दे | तवा गरमी से अजवाईन का अर्क कपडे से छन कर नीचे कटोरा में टपकेगा | उस अर्क को 10 बूँध शहद मिला कर बालकों को खिलाने से बालकों का ज्वर ,खाँसी ,जुकाम और पेट का दर्द अच्छा हो जाता है |


पालक

विवरण - पालक अथवा पालकी दो प्रकार की होती है | एक सीधी और एक छतरैया | छतरैया पालकी खाने में अच्छी होती है | पालकी के साग को गरम मसाला डाल कर और सोठ पीस कर डाले फिर बिना बिना कुछ खाये दस दिन तक खाय अथवा रोटी के साथ परहेज करे तो उदर में मल का अजीर्ण दूर हो जाता है | और बादी जाती रहती है | रक्तपित्त में पालक के रस में शहद मिला कर पीना चाहिये यह दस्तावर होता है |


तालमखान

नाम -सं - कोकिलाक्ष ,हिं- तालमखाना ,कैलया ,बं - कुलियास्वाडा ,म - बिखरा , गु-एखरा,लाँगलिव्ड बार्लेरिया | विवरण - कोकिलाक्ष के क्षुप प्रायः जल के निकट तथा चौमासे की की ताल और तलैयों में उत्पन्न होते हैं | पत्ते लम्बे होते हैं | क्षुप में काँटे होते हैं | गूमे के समान गाँठे होती हैं | उन गाँठों में से बीज निकलता है | उसको तालमखाना कहते हैं | गुण - तालमखाना मधुर ,शीतल, रूचिकारक ,स्निग्ध ,भारी ,कडुवा,खट्टा ,और ,स्वादिष्ट है | यह आमवात ,वातातिसार , तृषा,अश्मरी,वातरक्त,प्रमेह,शोथ,पित्त एवं दृष्टिरोग को दूर करता है | पत्ते स्वादिष्ट ,कडुवे ,शोथ,शूल,विष,एवं अनाह रोग नाशक तथा उदर पाण्डुरोग ,मलरोध,वातावष्टम्भ और मूत्र रोग हरने वाला है | तालमखाने का बीज - शीतल ,स्वादिष्ट,कसैला,कडुवा,वीर्य वर्धक,बलकारक ,भारी,गर्भस्थापक ,कफवातकारक मलस्तम्भक तथा रूधिर विकार ,दाह और पित्तनाशक है | 


अगस्त्य

नाम - सं - अगस्त्य,हिं-अगस्त्य,हथिया,बं-बक,अरबी-अगस्ता,गु- अगाथियों,अं-लार्जफ्लावर्डएगेट्री | विवरण - अगस्त्य के वृक्ष बाग -वाटिकाओं में अधिकतर होते हैं | पत्ते सहिजन के जैसे होते हैं | विषेश कर इस पर पान की बेल चढा करती है | इसलिये इसके पत्ते उत्तम होते हैं | इसके फूल लाल और सफेद होते हैं | फल्ली अत्यंत कोमल होती है | यह इसकी ठीक पहचान है कि जब अगस्त्य मुनि का उदय होता है तब ही फूल खिलते हैं | गुण - अगस्त्य शीतल ,रूक्ष ,कडुआ,कसैला ,चरपरा,मधुर ,भारी और किंचित गरम है | इससे भ्रम ,बलास ,कास भूत बाधा ,रतौंधी,पीनस,विष ,और रक्तपित्त ,रोग नष्ट होते हैं |  और वात,पित्त कफ नाशक ,चातुर्थिक और प्रतिश्याय निवारक तथा भ्रम विवर्णता विनाशक है | अगस्त्य की फल्ली सारक ,बुद्धिकारक ,रूचिकारक ,हल्की ,पचने में मधुर ,कडुवी स्मरण शक्तीवर्धक तथा त्रिदोष ,शूल ,कफ,पाण्डु ,विष ,शोथ और गुल्म नाशक है | रूक्ष और पित्त कारक है |


                                                                                                            

 

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